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Fri, 27 Feb 2026 04:21 PM

तिरंगे के असली शिल्पकार: बदरुद्दीन और सुरैया तैयब जी।

रिपोर्ट:*अब्दुल नईम कुरैशी

नई दिल्ली।

आज़ादी के 78 साल बाद भी, जब-जब तिरंगा हवा में लहराता है, हमारी आंखों में गर्व और सम्मान की चमक आ जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज का अंतिम स्वरूप, जिसे 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने मंज़ूरी दी, उसके पीछे एक दंपति का ऐतिहासिक योगदान था — बदरुद्दीन फैज़ तैयब जी और उनकी पत्नी *सुरैया तैयब* जी।

इतिहासकार *Trevor Royle* ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक *The Last Days of the Raj* में विस्तार से बताया है कि किस तरह यह डिज़ाइन, जिसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद पट्टी पर नीला अशोक चक्र और नीचे हरा रंग है, तैयब जी दंपति की रचना थी। यही ध्वज आज़ादी की पहली शाम, पंडित जवाहरलाल नेहरू की कार पर गर्व से लहरा रहा था।

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*बदरुद्दीन फैज़ तैयब जी—एक बहुआयामी व्यक्तित्व*

*जन्म:* 1907

*मृत्यु:* 1995

*पेशा:* इंडियन सिविल सर्विस (ICS) के वरिष्ठ अधिकारी।

*विदेश सेवा:* 1948 में ब्रुसेल्स में भारतीय दूतावास की स्थापना। टोक्यो, तेहरान और जकार्ता में भारत के राजदूत रहे।

शिक्षा सेवा: 1962-1965 तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर।

उनकी प्रशासनिक क्षमता और कूटनीतिक कौशल की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती रही। लेकिन राष्ट्रध्वज के अंतिम रूप में उनका योगदान शायद सबसे भावुक और ऐतिहासिक है।

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*सुरैया तैयब जी* — सौंदर्य और प्रतीकवाद की संवाहक

सुरैया तैयब जी एक शिक्षित, कलाप्रेमी और दूरदर्शी महिला थीं। उन्होंने ध्वज के रंगों, अनुपात और अशोक चक्र की स्थिति को लेकर बारीक अध्ययन किया।

*केसरिया:* साहस और बलिदान का प्रतीक

*सफ़ेद:* सत्य, शांति और ईमानदारी का प्रतीक

*हरा:* प्रगति और उर्वरता का प्रतीक

*अशोक चक्र:* गति और धर्म का चिरंतन संदेश


उनके डिज़ाइन ने ध्वज को एक ऐसा स्वरूप दिया जो धर्मनिरपेक्ष, सर्वसमावेशी और भारतीयता का सच्चा प्रतिबिंब है।

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*22 जुलाई 1947 — वह ऐतिहासिक दिन:*

संविधान सभा में इस ध्वज के प्रारूप को प्रस्तुत किया गया और सर्वसम्मति से इसे भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया।


इसी के साथ क्रांतिकारियों के सपनों का ध्वज आज़ाद भारत का प्रतीक बन गया।

15 अगस्त 1947 की शाम, जब पंडित नेहरू की कार लाल किले से निकली, तो यह ध्वज हवा में लहरा रहा था — एक नए युग की शुरुआत का गवाह।


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*इतिहास की छाया में दबा योगदान:*

विडंबना यह है कि बदरुद्दीन और सुरैया तैयब जी का नाम आज़ादी की मुख्यधारा की कहानियों में अक्सर नज़र नहीं आता। बहुत से लोग मानते हैं कि ध्वज बस “समय के साथ तय हो गया”। लेकिन सच्चाई यह है कि इसके रंगों का क्रम, मध्य में अशोक चक्र का समावेश और डिज़ाइन का संतुलन — सब तैयब जी दंपति की सोच और मेहनत का नतीजा है।

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*राष्ट्र को संदेश:*

आज, जब तिरंगा देश के हर कोने में लहराता है, हमें याद रखना चाहिए कि यह केवल एक कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों, संघर्षों और बलिदानों का प्रतीक है।

बदरुद्दीन-सुरैया तैयब जी जैसे गुमनाम नायकों को सम्मान देना, हमारे इतिहास के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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? *सम्पादकीय टिप्पणी:*

“राष्ट्रध्वज के नीचे हम सभी बराबर खड़े होते हैं — धर्म, जाति, भाषा या प्रांत से परे। यह ध्वज हमें बताता है कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है। तैयब जी दंपति ने इसे केवल डिज़ाइन नहीं किया, बल्कि उसमें भारत की आत्मा को बुन दिया।”

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Jr. Seraj Ahmad Quraishi
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