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धार्मिक / Jul 08, 2024

मुस्लिम समुदाय का नव वर्ष, मोहर्रम 1446हिजरी, 2024 का हुआ शुभारंभ।

शहाबुद्दीन अहमद

बेतिया, बिहार।

मुस्लिम समुदाय का नव वर्ष मोहर्रम के महीना से शुरुआत होती है,इस्लाम धर्म में मोहर्रम का महीना बहुत ही खास और रमजान की ही तरह पाक माना जाता है,इस्लामी मान्यता है कि इस महीने में इमाम हुसैन उनके साथियों की शहादत हुई थी,जिसकी याद में मातम का महीने के रूप में मानते हैं, मगर सुन्नी समुदाय के मुसलमान इसको खुशी का महीना भी कहते हैं,जबकि शिया समुदाय के मुसलमान इसको गम का महीना कहते हैं,मोहर्रम का महीना इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने याने मोहर्रम का दसवां दिन मुसलमान के लिए काफी खास होता है,जिसे यौमे आशूरा कहा जाता है,मोहर्रम के महीना को मुसलमान नए साल के रूप में मनाया जाता है,इसे बकरीद के 20 दिनों के बाद मानाते हैं,हालांकि भारत में मोहर्रम शुरू होने की तारीख चांद निकलने पर तय होती है, सुन्नी समुदाय के मुताबिक मोहर्रम के महीने में अल्लाह की इबादत करने और रोजा रखने से अल्लाह की रहमत बरसती है l इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक मोहर्रम के महीने की शुरुआत 7 जुलाई 2024 से हो रही है,वही मोहर्रम के दसवें दिन यानी 17 जुलाई को दुनिया भर मेंआशुरा मनाया जाएगा lआशूरा की दिन कर्बला की जंग में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के छोटे नवासे हजरत इमाम हुसैन शहीद हुए थे,शिया समुदाय के लोग इस महीने को उत्सव के बजाय शोक की महीने के रूप में मनाते हैं,शिया मुसलमान इस महीने में इमाम हुसैन की मौत का मातम मनाते हैं,गम में रहकर नौहां,सीना पीटते है, ताजिया निकलते हैं,मगर ठीक इसके विपरीत सुन्नी समुदाय के मुसलमान इस महीने की खुशी के महीना के रूप में भी मानते हैं,पुरानी परंपराओं को देखा जाए तो इसमें पुराने जमाने के मानने वाले मुसलमान गलत काम करने से परहेज करते हैं,मगर इस आधुनिक युग में,यहां शिक्षा की काफी प्रमुखता है,सुन्नी समुदाय के मुसलमान उच्च शिक्षा प्राप्त कर,दीनी तालीम को हासिल करके,इस मुहर्रम के महीने को पाक महीना समझकर 2 दिन नवमी और दशमी मोहर्रम को रोजा रखते हैं,इबादत करते हैं,गरीबों व मिस्किनों को खाना खिलाते हैं, और इस्लाम धर्म के बताए हुए रास्ते पर चलकर कई पुरानी परंपराओं को छोड़ते हुए,पाक महीना समझकर इबादत करते हैं l मोहर्रम के महीने में कुछ मुसलमान के द्वारा ताजिया निकलना,अखाड़ा निकालना, मेला लगाने की परंपरा चली आ रही है,जो इस्लामी कानून के विरुद्ध है l

Karunakar Ram Tripathi
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