ओपन लेटर टू सुप्रीम कोर्ट – हमारे बेज़ुबान साथियों और इंसानी सुरक्षा के लिए संतुलित समाधान।
रिपोर्ट:अब्दुल नईम कुरैशी
लखनऊ/उत्तर प्रदेश।
*माननीय सुप्रीम कोर्ट*,
हम आपके निर्णयों का सम्मान करते हैं, क्योंकि ये न्याय और संवेदनशीलता की नींव पर खड़े होते हैं।
हाल ही में लिया गया आपका निर्णय — तीन लाख स्ट्रीट डॉग्स को उनकी गलियों से हटाकर शेल्टरों में रखने का — हमारे दिल में चिंता पैदा करता है।
ये वही कुत्ते हैं जो बरसों से हमारी गलियों के रक्षक रहे हैं।
जैसे मुंशी प्रेमचंद की कहानी “पूस की एक रात” में हल्कू का वफादार कुत्ता जबरा —
जो ठंडी रात में जागता रहा, भौंकता रहा, नीलगायों को भगाने की कोशिश करता रहा…
लेकिन हल्कू न उठा, और पूरी फसल नीलगायों ने बर्बाद कर दी।
जबरा अपनी वफादारी निभा गया — लेकिन इंसान की लापरवाही से मेहनत का फल चला गया।
इंसान तो लापरवाही में सोता रहा लेकिन वो कुत्ता रात की रखवाली में अपनी पूरी ईमानदारी दिखाई
आज के हमारे स्ट्रीट डॉग्स भी ऐसे ही जबरा हैं —
रात-दिन हमारी गलियों के चौकीदार,
अजनबी को पहचानने वाले, और कई बार खतरे को टाल देने वाले।
ये वही कुत्ते हैं जो बरसों से हमारे साथ हैं।
गर्मियों सर्दियों और बरसात सभी मौसम की मार के बावजूद ये हमारे मोहल्लों के अनकहे पहरेदार रहे हैं।
ये हमारे बच्चों के साथी, बुजुर्गों के हमसफर और कई अकेलेपन से जूझते दिलों के सहारे हैं।
लेकिन सच का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
साल भर में लाखों लोग इन आवारा कुत्तों के काटने से रेबीज़ का शिकार होते हैं और हज़ारों अपनी जान भी गंवा देते हैं।
हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की जान जोखिम में पड़े — न इंसान की, न जानवर की।
इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसा रास्ता खोजें जिसमें दोनों सुरक्षित रहें।
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*हमारा व्यावहारिक और मानवीय सुझाव:*
1. सभी स्ट्रीट डॉग्स का अनिवार्य एंटी-रेबीज़ टीकाकरण
नगर निगम, पशु चिकित्सा विभाग और NGOs के सहयोग से एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाए।
हर कुत्ते को पहचान टैग (या माइक्रोचिप) देकर दर्ज किया जाए, ताकि उसकी निगरानी हो सके।
2. डॉग लवर्स और संस्थाओं को जिम्मेदारी देना
हर रजिस्टर्ड डॉग लवर या संस्था को 10–10 कुत्तों की देखभाल की जिम्मेदारी दी जाए।
वे ही उसके “कानूनी अभिभावक” माने जाएं और उसकी सेहत, सफाई और टीकाकरण की जिम्मेदारी निभाएं।
अगर भविष्य में वह कुत्ता किसी को काटता है, तो जिम्मेदारी उसी “अभिभावक” पर हो।
3. सामुदायिक कुत्ता देखभाल केंद्र
गलियों में ही छोटे-छोटे फीडिंग और देखभाल पॉइंट बनाए जाएं, ताकि कुत्तों को भूखा और हिंसक होने से रोका जा सके।
4. जनजागरूकता अभियान
लोगों को सिखाया जाए कि कुत्तों के साथ सुरक्षित तरीके से कैसे व्यवहार करें और अगर काट लें तो तुरंत क्या करें।
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माननीय अदालत,
शेल्टर में डाल देना आसान विकल्प है, लेकिन यह कुत्तों की प्रजाति के खत्म होने, भीड़भाड़, बीमारी और क्रूरता का कारण बन सकता है।
हम मानते हैं कि शहरों में व्यवस्था जरूरी है, लेकिन व्यवस्था का मतलब मासूमों की आज़ादी छीनना नहीं होना चाहिए।
यदि ऊपर बताए गए समाधान लागू हों, तो:
इंसान भी सुरक्षित रहेंगे।
कुत्ते भी अपने परिचित माहौल में रहेंगे।
सफाई, टीकाकरण और देखभाल से रेबीज़ का खतरा खत्म होगा।
और इंसान व जानवर — दोनों एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में जी सकेंगे।
न्याय का असली अर्थ यही है कि यह हर उस जीव तक पहुंचे जो इस धरती पर सांस लेता है।
हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस विषय पर फिर से विचार करें और ऐसा संतुलित रास्ता अपनाएं जिसमें जिंदगी, सुरक्षा और सह-अस्तित्व — तीनों एक साथ चलें।
सादर,
एक आवाज़… इन बेज़ुबानों और इंसानों के लिए