गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग,प्रतिबंधित मांस की निर्यात,बिक्री,खाने पर लगे प्रतिबंध :--सुरैया शहाब
शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
केंद्र की भाजपा शासित मोदी सरकार से,गाय को राष्ट्रीय पशु की दर्जा देने की घोषणा करने की जनहित में मांग करते हुए,अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सह सामाजिक कार्यकर्ता,सुरैया सहाब ने कहा है कि इस विषय पर पूरे देश में मुस्लिम संगठनों, मुस्लिम उलेमा,शिक्षाविद की तरफ से यह पुरजोर मांग की जा रही है कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए, ताकि इसका संरक्षण हो सके
इसके साथ ही प्रतिबंधित मांस के निर्यात,बिक्री,काटने, खाने पर प्रतिबंध लगाई जाए ताकि देश में गौकशी के साथ साथ गौतस्करी से संबंधित समस्याओं का निराकरण हो सके।इस समस्या को लेकर पूरे देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ जाता है, आपस में दुश्मनी, मोबलिंचिंग,लूटपाट,मर्डर,आआगगजनी,मुस्लिम समुदाय के लोगों के दुकान,मकान में आग लगाना,तोड़फोड़,हत्या करना का मामला नित्यदिन सुनने,देखने को मिलता है।
यह कहा जा सकता है कि " "न रहेगी बांस और न ही बजेगी बांसुरी" की कहावत चरितार्थ हो सकेगी।
देश केअंदर बहुत ऐसे राष्ट्रीय गैर संवैधानिक,गैर मान्यता प्राप्त संगठन है,जो इस बिंदु को लेकर कई बार,कई राज्यों में सांप्रदायिक सौहार्द को बिगड़ चुके हैं,खरबो रूपयों की मुस्लिम समुदाय की संपत्ति को लुटा गया,बर्बाद किया गया,कई परिवार के लोगों को नेस्तनाबूद कर दिया,मुस्लिम समुदाय के कई परिवार के लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया,इस तरह कीअधिक घटनाएं गुजरात राज्य में हुई है। इस राष्ट्रीय समस्या का समाधान मात्र यही है कि " गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा" देकर
इसकी कहानी को ही समाप्त कर दिया जाए।देशऔर राज्यों केअंदर कई ऐसे गैर संवैधानिक,गैर मान्यता प्राप्त संगठन काम कर रहे हैं,जो इस समस्या को लेकर मुस्लिम समुदाय को बहुत हानि पहुंचा रहे हैं,गाये के नाम पर होने वाली तरह तरह के मोबलिंचिंग,बेगुनाह इंसानों की हत्या,नफरत की राजनीति,मुसलमानों को बदनाम करने का यह खेल अब बंद होना चाहिए,हमें खुशी होगी कि यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जाए,ताकि न किसी इंसान की जान जाए और न ही धर्म के नाम पर राजनीति हो,साथ ही देश कीआर्थिक स्थिति भी कमजोर नहीं हो देश की कई राज्यों में प्रतिबंधित मांस का लोग सुचारु रूप से इस्तेमाल करते हैं,जो इनका खाद्य सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता है,वहां किसी प्रकार का कोई सांप्रदायिक सौहार्द को बिगड़ने की घटना नहीं होती है,मगर देश के बहुत ऐसे राज्य भी हैं,जहां की जनता
इस प्रतिबंधित मांस से परहेज करती है,मगर कुछ सरफिरे,असामाजिक तत्व गुंडे,मवाली इसको लेकर हंगामा खड़ा करते हैं,इसके साथ ही अनेकों प्रकार के हरबा का प्रयोग करके मुस्लिम समुदाय के नवयुवकों,नवयुवतियों, दुकानदारों,जिनमें महिला पुरुषों को टॉर्चर करते हैं, उनके घरों और दुकानों में आग लगा देते हैं,हत्या की घटना कोअंजाम देते हैं।
भारतवर्ष जैसे महान देश के लिए यह बहुतशर्मनाक घटना होती है।क्या "मादर ऑफ डेमोक्रेसी " में इंसान की जान
की वैल्यू सिर्फ इतना ही है कि उसे जानवर के नाम पर मार दिया जाए,आज हिन्दू भाई गाय बचाने हमारे साथ क्यों नहीं खड़े हैं।