जनगणना, पलायन और सच्चाई: मुसलमानों की बदलती आबादी पर एक एतिहासिक दृष्टि।
✍️ लेखक: *सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी*
चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन
जयपुर, राजस्थान।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के संभल नगर पालिका क्षेत्र को लेकर एक सरकारी जाँच रिपोर्ट मीडिया में सामने आई। इसमें दावा किया गया कि 1947 में वहाँ हिंदू आबादी 45% थी और अब केवल 15% बची है। यह रिपोर्ट भले ही लीक होकर सामने आई हो, लेकिन इसे जिस अंदाज़ में प्रचारित किया गया, वह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए ख़तरनाक है। एकतरफ़ा आँकड़े पेश करके नफ़रत को हवा देना किसी भी सरकार या मीडिया की ज़िम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।
लेकिन चूँकि यह चर्चा अब सार्वजनिक हो चुकी है, तो यह सवाल उठना ज़रूरी है कि आख़िर मुसलमानों की आबादी और उनकी स्थिति पर कोई जाँच क्यों नहीं होती? क्या आज़ादी के बाद से लेकर अब तक केवल हिंदू घटे हैं या मुसलमानों ने भी विभाजन, दंगे और नीतिगत भेदभाव की मार झेली है?
*दिल्ली: विभाजन का सबसे बड़ा ज़ख़्म*:
1941 में दिल्ली में मुसलमानों की आबादी लगभग 33% थी। 1947 के विभाजन के बाद जब दंगे हुए, तो लाखों मुसलमानों को मार दिया गया या वे पाकिस्तान हिजरत करने पर मजबूर हुए। इसका सीधा असर यह हुआ कि 1951 की जनगणना में दिल्ली के मुसलमान केवल 5.7% रह गए।
आज 2011 की जनगणना बताती है कि यह संख्या बढ़कर 12.9% हुई है, लेकिन 1941 की तुलना में अब भी आधे से भी कम है।
*जम्मू 1947: ख़ून से सनी ज़मीन*:
जम्मू क्षेत्र में 1947 में मुसलमानों पर संगठित हिंसा की गई। हज़ारों की जान गई, लाखों विस्थापित हुए। आँकड़े बताते हैं कि कुछ जिलों में जहाँ मुसलमान 40% से ज़्यादा थे, वे घटकर 7–8% पर आ गए। यह आँकड़े किसी “प्राकृतिक गिरावट” के नहीं, बल्कि साफ़ तौर पर नरसंहार और जबरन पलायन के गवाह हैं।
*हैदराबाद और भोपाल: सत्ता बदली, आबादी बदली*:
1948 में हैदराबाद राज्य पर “पुलिस एक्शन” हुआ। उसके बाद मुसलमानों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बदली और आबादी अनुपात भी गिरा। हैदराबाद शहर में जहाँ कभी मुसलमान लगभग आधे थे, आज ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम क्षेत्र में उनकी आबादी केवल 30% रह गई है।
भोपाल में भी यही तस्वीर है। भोपाल रियासत में मुसलमान बड़ी आबादी रखते थे, लेकिन 2011 की जनगणना में भोपाल शहर में मुसलमान मात्र 26% दर्ज हुए।
*गुजरात, मुज़फ्फरनगर और दिल्ली: विस्थापन की त्रासदी*:
गुजरात 2002: दंगों के बाद एक लाख से ज़्यादा मुसलमान अपने घरों से बेदख़ल हुए और अब तक रीलिफ़ कॉलोनियों में जीवन बिता रहे हैं।
मुज़फ्फरनगर 2013: पचास हज़ार से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए। आज भी बहुत से परिवार अपने गाँव वापस नहीं जा सके।
दिल्ली 2020: 53 लोग मारे गए, सैकड़ों घर और दुकानें जला दी गईं। जाँच में पक्षपात और पीड़ितों के साथ अन्याय के आरोप लगातार उठते रहे।
*सचर समिति और मुसलमानों की स्थिति*:
2006 में आई सचर समिति रिपोर्ट ने साफ़ कहा कि भारत का मुसलमान सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पैमानों पर औसत से बहुत पीछे है। सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी बेहद कम है। शहरों में उनका गेट्टोकरण हो रहा है। बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच सीमित है।
2017 में आए NCAER और NSS के आँकड़ों ने भी यही दोहराया—औपचारिक रोज़गार, शिक्षा और संपत्ति में मुसलमान लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।
*झूठे डर और वास्तविकता*:
आज मुसलमानों को लेकर यह अफ़वाह फैलाई जाती है कि “वे तेज़ी से बढ़कर बहुसंख्यक हो जाएँगे।” लेकिन हक़ीक़त यह है कि मुसलमानों की जन्मदर लगातार गिर रही है और अब यह दर राष्ट्रीय औसत के बहुत क़रीब है। Pew Research (2021) ने साफ़ कहा कि यह डर भ्रामक है।
*निष्कर्ष*:
संभल की जाँच रिपोर्ट हो या अन्य राज्य—एकतरफ़ा आँकड़े सामने रखकर समाज को बाँटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अगर सरकार सचमुच “जनसांख्यिकीय बदलाव” की जाँच करना चाहती है, तो उसे उन सभी जगहों की भी जाँच करनी चाहिए, जहाँ मुसलमानों की आबादी हिंसा, पलायन और नीतिगत भेदभाव के कारण घटी है।
भारत की असली ताक़त इसी में है कि वह हर धर्म और हर समुदाय के साथ न्याय करे। सिर्फ़ एक पक्ष की चिंता और दूसरे की अनदेखी—यह न देशहित है, न इंसाफ़